Saturday, January 20, 2018

जब तुमसे ..सम्बंध नहीं थे !

नमस्कार दोस्तों ..
इस गीत की पहली दो पंक्तियाँ मेरे अनुज गोविन्द जी द्वारा मुझे दी गई थी उसी का विस्तारित रूप आपके समक्ष हैं ....
जब तुमसे ..सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से ...अनुबंध नहीं थे !!
रचनायें थी, बिल्कुल कोरी !
उनमें लय और छंद नहीं थे !!

जब तुमसे ..सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से ...अनुबंध नहीं थे !!

सांसें इतनी ...तिक्त नहीं थी !
नजरें भी ..संदिग्ध नहीं थी !!
नींद बहुत अच्छी, आती थी !
रातें इतनी ....रिक्त नहीं थी !!
मन संकुचित सा.. रहता था !
पर द्वार ह्रदय के बंद नहीं थे !!
जब तुमसे ..सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से ...अनुबंध नहीं थे !!

अश्रु जनित आलाप नहीं था !
प्रहर प्रहर ...संताप नहीं था !!
पुरवाई शीतल.... शीतल थी !
किरणों में वो, ताप नहीं था !!
पुष्प पलाश के खिलते तो थे !
पर उनमें ....मकरंद नहीं थे !!
जब तुमसे ...सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से .....अनुबंध नहीं थे !!

रात्रि-दिवस का भान नहीं था !
उपवन था बियाबान नहीं था !!
होश भले ..कम ही रहता था !
पर खुद से..अंजान नहीं था !!
सीमाएं विस्तृत...विस्तृत थी !
टूट चुके .....तट बंध नहीं थे !!
जब तुमसे ...सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से .....अनुबंध नहीं थे !!

श्वासों का, संवेग भी कम था !
भावुकता आवेग भी कम था !!
सूख चुके नयनो के जलाशय !
भावों का ..उद्वेग भी कम था !!
माना जीवन कठिन बहुत था !
पर इतने,, प्रतिबन्ध नहीं थे !!
जब तुमसे ....सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से ......अनुबंध नहीं थे !!

किसे पता था, प्रीत यूं होगी !
प्रिये प्रीत की.. रीत यूं होगी !!
हार मुझे ..स्वीकार्य ही होती !
अगर जानता, जीत यूं होगी !!
याद तुम्हें निशदिन करते थे !
हां इतने भी...पाबंद नहीं थे !!
जब तुमसे ...सम्बंध नहीं थे !
पीड़ा से ......अनुबंध नहीं थे !!
...हरीश भट्ट ...

Sunday, December 10, 2017

मुक्तक

शब्द मेरे सब,, तुम्हारे हो गए !
रूप की लावण्यता में. खो गए !!
अर्थ जब ना पा सके, संसर्ग में !
दर्द की आधिक्यता में, रो गए !!

मुक्तक- रावण राज


त्रेता का वैभव गया, कलियुग हैं ये आज !
घर घर रावण ही मिले, कहाँ राम का राज !!
जनकसुता भयभीत हैं, अवचेतन हनुमंत !
राम शिथिल हैं आज के,... रावण तीरंदाज !!

ताज

जब दूध  से धुला तो उसे ताज कहा था
दीवानगी का रोशन अंदाज कहा था
तामीर हो चूका जब वो हुस्न-इ-मुज़सम
उसे चाहने वालों ने मुमताज कहा था

मुक्तक



जाने क्या क्या मेरी, बातों के इशारे बैठे !
दिल मेरा सौ सौ दफा,, दर्द के मारे बैठे !!
जो रंजिशें हैं बिना बात की, सुलझा लेंगे !
आ के फुर्सत किसी दरिया के किनारे बैठें !!

चल कहीं बैठ के दिलकश से तराने लिख दे
इक मुझे ख़त कहीं मिलने के बहाने लिख दे
ये जो ख़ामोशी सी पसरी हैं समंदर की तरह
आ के इस पर तू मुहब्बत के फ़साने लिख दें

जन्म दिन

सुना हैं
आज
तुम्हारा जन्मदिन है

पर मैंने तो
 सुना था की
परियां
जन्म नहीं लेती
आसमान से उतरती हैं

ये भी की
लौट जाती हैं
अपने अपने
परिस्तान मैं
ख्वाब
पूरे हो जाते हैं जब
वो तो
परे हैं
जन्मने अजन्मने
के बंधन से
फिर भी
बधाई देता
हर पल छिन  हैं
सुना हैं की
आज
तुम्हारा
जन्मदिन हैं

तभी मैं कहूं
आज
कुछ जियादा हैं
रौशनी शायद
खुशबूएं हैं
हवाओं में
रागनी सी हैं

बहका हुआ हैं
हर इक गुलाब
इतराया हुआ सा
गुलमोहर पे आमादा
शायरी सी हैं

रक्खें हों किसी ने
आज दुनिया मैं
कदम
मुमकिन हैं
सुना हैं
की आज
तुम्हारा जन्मदिन हैं

यूं ही

कल मैने धर्म पत्नी जी से कहा इस मिसरे पर कुछ तरही गजल सुझा दें मिसरा था ....

"न किसी राहबर न रहगुजर से निकलेगा "
धर्मपत्नी ने मज़ाहिया अंदाज में जो कहा आपकी नजर

मेरा तो अब उस दिन ये दर्द सर से निकलेगा !
जब ये चाबियों का गुच्छा कमर से निकलेगा !! सास को

कभी जो काम बताओ तो पढ़ाई का रोना हैं !
खबरदार जो छुट्टी के दिन तू घर से निकलेगा !! बेटे को

हर लम्हा नजर टिकी रहती हैं लाइक कमेंटों पे !
ये फेसबुकिया भूत कब तेरे सर से निकलेगा !! बेटी को

न जाने कब बंद होगा छत पे टहलना इसका !
न जाने कब ये पड़ोसन के असर से निकलेगा !!पति को

इस शहर के सब दुकानदार मुझसे वाकिफ हैं !
हैं कोई मॉल जो अब मेरी नजर से निकलेगा !! खुद को